मानसिक सेहत के लिए सप्ताह में कितने घंटे काम करना जरूरी, 90 घंटे काम पर बहस के बीच सर्वे में सरकार ने बता दिया
देश में सप्ताह में 70 से 90 घंटे काम करने पर बहस हो रही है। इसी बीच आर्थिक सर्वे 2025 संसद में पेश किया गया जिसमें अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के लिए सप्ताह में 55 घंटे से कम काम की सलाह दी गई है। बताया गया कि हफ्ते 70 घंटे काम करना दूर की बात 55-60 घंटे का काम का भी मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
बजट 2025 से पहले शुक्रवार को आर्थिक सर्वेक्षण संसद में पेश किया गया।तेज विकास के लिए सप्ताह में 70 से लेकर 90 घंटे तक काम करने पर चल रही कॉरपोरेट बहस के बीच आर्थिक सर्वेक्षण में एक अध्ययन का हवाला देकर कहा गया है कि सप्ताह में 55-60 घंटे काम करने पर भी सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
आर्थिक सर्वेक्षण में विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययन का भी हवाला दिया गया है। इसके अनुसार अवसाद और बेचैनी की वजह से पूरी दुनिया में हर दिन 12 अरब कार्य दिवस का नुकसान होता है। कीमत में इसे जोड़ा जाए तो नुकसान वैश्विक तौर पर आज के दिन 87 लाख करोड़ का नुकसान अवसाद के कारण हो रहा है।
दफ्तर में कार्य संस्कृति के साथ सीनियर का व्यवहार भी अहमकामगारों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए आफिस की कार्य संस्कृति के साथ-साथ सीनियर के व्यवहार को भी अहम बताया गया है। सर्वेक्षण के मुताबिक मानसिक स्वास्थ्य मापदंड (मेंटल हेल्थ कोशेंट- एमएचक्यू) के तहत कामगारों का अध्ययन किया गया।
बेहतर काम के लिए शारीरिक और मानसिक संतुलन जरूरी
इसके मुताबिक एमएचक्यू पर -100 से -50 एमएचक्यू वाले कामगार महीने में केवल 15 दिन ही आफिस में काम करने लायक होते हैं। जबकि 150 से 200 एमएचक्यू वाले कामगार महीने में 28 दिन तक काम लायक होते हैं। जाहिर है बेहतर काम के लिए कामगारों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन काफी जरूरी है।
अल्ट्रा फास्ट फूड के बढ़ते चलन पर चिंताआर्थिक सर्वेक्षण ने नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए अल्ट्रा फास्ट फूड के बढ़ते चलन पर चिंता जताई है। अल्ट्रा फास्ट फूड सिर्फ नागरिकों का ही नहीं, अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक हो सकता है। इसमें मौजूद तत्व मोटापा, हृदय व मानसिक रोगों के साथ-साथ कई बीमारियों का कारक बनता है।
बीमारियों के खतरे से निपटने के लिए कई नियम कानून
वैसे भारत ने अल्ट्रा प्रोसेसिंग फूड के कारण कई तरह के बीमारियों के खतरे से निपटने के लिए कई नियम व कानून बनाए हैं, लेकिन वे इसके बढ़ते उपभोग को रोकने में नाकाफी साबित हो रहे हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में इसके लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाने और खाद्य पदार्थों में संतृप्त वसा, सोडियम और चीनी की मात्रा नियंत्रित करने के लिए कड़े नियम बनाने व लागू करने पर जोर दिया गया है।
0 comments: